श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.49

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

आस्तीर्य दर्भैः प्रागग्रैः कार्त्स्न्येन क्षितिमण्डलम्।

स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैषि यत्परम्।

तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया॥ ४९

āstīrya darbhaiḥ prāgagraiḥ kārtsnyena kṣitimaṇḍalam|

stabdho bṛhadvadhānmānī karma nāvaiṣi yatparam|

tatkarma haritoṣaṃ yatsā vidyā tanmatiryayā|| 49

अर्थ

पूर्वकी ओर अग्रभागवाले कुशाओंसे सम्पूर्ण भूमण्डलको आच्छादित करके अनेकों पशुओंका वध करनेसे तुम बड़े कर्माभिमानी और उद्धत हो गये हो; किन्तु वास्तवमें तुम्हें कर्म या उपासना—किसीके भी रहस्यका पता नहीं है। वास्तवमें कर्म तो वही है, जिससे श्रीहरिको प्रसन्‍न किया जा सके और विद्या भी वही है, जिससे भगवान्‌में चित्त लगे॥ ४९॥✎ 420 1608

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #420 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #1608 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (आत्मतत्त्व)-को → (आत्मतत्त्व)को

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