श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम्।

यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान्॥ ५

buddhiṃ tu pramadāṃ vidyānmamāhamiti yatkṛtam|

yāmadhiṣṭhāya dehe'smin pumān bhuṅkte'kṣabhirguṇān|| 5

अर्थ

बुद्धि अथवा अविद्याको ही तुम पुरंजनी नामकी स्त्री जानो; इसीके कारण देह और इन्द्रिय आदिमें मैं-मेरेपनका भाव उत्पन्‍न होता है और पुरुष इसीका आश्रय लेकर शरीरमें इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको भोगता है॥ ५॥✎ 1342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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