श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम्।

सख्यस्तद‍्वृत्तयः प्राणः पंचवृत्तिर्यथोरगः॥ ६

sakhāya indriyagaṇā jñānaṃ karma ca yatkṛtam|

sakhyastadvṛttayaḥ prāṇaḥ paṃcavṛttiryathoragaḥ|| 6

अर्थ

दस इन्द्रियाँ ही उसके मित्र हैं, जिनसे कि सब प्रकारके ज्ञान और कर्म होते हैं। इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ ही उसकी सखियाँ और प्राण-अपान-व्यान-उदान-समानरूप पाँच वृत्तियोंवाला प्राणवायु ही नगरकी रक्षा करनेवाला पाँच फनका सर्प है॥ ६॥✎ 1342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1342 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृत्तियों-वाला → वृत्तियोंवाला

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