श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

बृहद्बलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम्।

पंचालाः पंच विषया यन्मध्ये नवखं पुरम्॥ ७

bṛhadbalaṃ mano vidyādubhayendriyanāyakam|

paṃcālāḥ paṃca viṣayā yanmadhye navakhaṃ puram|| 7

अर्थ

दोनों प्रकारकी इन्द्रियोंके नायक मनको ही ग्यारहवाँ महाबली योद्धा जानना चाहिये। शब्दादि पाँच विषय ही पांचालदेश हैं, जिसके बीचमें वह नौ द्वारोंवाला नगर बसा हुआ है॥ ७॥✎ 1342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1342 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृत्तियों-वाला → वृत्तियोंवाला

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