श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.61

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

शयानमिममुत्सृज्य श्‍वसन्तं पुरुषो यथा।

कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा॥ ६१

śayānamimamutsṛjya śvasantaṃ puruṣo yathā|

karmātmanyāhitaṃ bhuṅkte tādṛśenetareṇa vā|| 61

अर्थ

स्वप्नावस्थामें मनुष्य इस जीवित शरीरका अभिमान तो छोड़ देता है, किन्तु इसीके समान अथवा इससे भिन्‍न प्रकारके पशु-पक्षी आदि शरीरसे वह मनमें संस्काररूपसे स्थित कर्मोंका फल भोगता रहता है॥ ६१॥

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