इस मनके द्वारा जीव जिन स्त्री-पुत्रादिको ‘ये मेरे हैं’ और देहादिको ‘यह मैं हूँ’ ऐसा कहकर मानता है, उनके किये हुए पाप-पुण्यादिरूप कर्मोंको भी यह अपने ऊपर ले लेता है और उनके कारण इसे व्यर्थ ही फिर जन्म लेना पड़ता है॥ ६२॥
ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन्।
गृह्णीयात्तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भवः॥ ६२
इस मनके द्वारा जीव जिन स्त्री-पुत्रादिको ‘ये मेरे हैं’ और देहादिको ‘यह मैं हूँ’ ऐसा कहकर मानता है, उनके किये हुए पाप-पुण्यादिरूप कर्मोंको भी यह अपने ऊपर ले लेता है और उनके कारण इसे व्यर्थ ही फिर जन्म लेना पड़ता है॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 561) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/62/