मनके सामने इन्द्रियोंसे अनुभव होनेयोग्य पदार्थ ही भोगरूपमें बार-बार आते हैं और भोग समाप्त होनेपर चले जाते हैं; ऐसा कोई पदार्थ नहीं आता, जिसका इन्द्रियोंसे अनुभव ही न हो सके। इसका कारण यही है कि सब जीव मनसहित हैं॥ ६८॥✎ 421
सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः।
आयान्ति वर्गशो यान्ति सर्वे समनसो जनाः॥ ६८
मनके सामने इन्द्रियोंसे अनुभव होनेयोग्य पदार्थ ही भोगरूपमें बार-बार आते हैं और भोग समाप्त होनेपर चले जाते हैं; ऐसा कोई पदार्थ नहीं आता, जिसका इन्द्रियोंसे अनुभव ही न हो सके। इसका कारण यही है कि सब जीव मनसहित हैं॥ ६८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.68 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 561) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/68/