साधारणतया तो सब पदार्थोंका क्रमशः ही भान होता है; किन्तु यदि किसी समय भगवच्चिन्तनमें लगा हुआ मन विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो जाय, तो उसमें भगवान्का संसर्ग होनेसे एक साथ समस्त विश्वका भी भान हो सकता है—जैसे राहु दृष्टिका विषय न होनेपर भी प्रकाशात्मक चन्द्रमाके संसर्गसे दीखने लगता है॥ ६९॥
सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि।
तमश्चन्द्रमसीवेदमुपरज्यावभासते ॥ ६९
साधारणतया तो सब पदार्थोंका क्रमशः ही भान होता है; किन्तु यदि किसी समय भगवच्चिन्तनमें लगा हुआ मन विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो जाय, तो उसमें भगवान्का संसर्ग होनेसे एक साथ समस्त विश्वका भी भान हो सकता है—जैसे राहु दृष्टिका विषय न होनेपर भी प्रकाशात्मक चन्द्रमाके संसर्गसे दीखने लगता है॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 562) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/69/