श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.74

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

एवं पंचविधं लिंगं त्रिवृत् षोडशविस्तृतम्।

एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते॥ ७४

evaṃ paṃcavidhaṃ liṃgaṃ trivṛt ṣoḍaśavistṛtam|

eṣa cetanayā yukto jīva ityabhidhīyate|| 74

अर्थ

इस प्रकार पंचतन्मात्राओंसे बना हुआ तथा सोलह तत्त्वोंके रूपमें विकसित यह त्रिगुणमय संघात ही लिंगशरीर है। यही चेतनाशक्तिसे युक्त होकर जीव कहा जाता है॥ ७४॥

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