श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.77

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम्।

मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम्॥ ७७

yāvadanyaṃ na vindeta vyavadhānena karmaṇām|

mana eva manuṣyendra bhūtānāṃ bhavabhāvanam|| 77

अर्थ

जिस प्रकार जोंक, जबतक दूसरे तृणको नहीं पकड़ लेती, तबतक पहलेको नहीं छोड़ती—उसी प्रकार जीव मरणकाल उपस्थित होनेपर भी जबतक देहारम्भक कर्मोंकी समाप्ति होनेपर दूसरा शरीर प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक पहले शरीरके अभिमानको नहीं छोड़ता। राजन्! यह मनःप्रधान लिंगशरीर ही जीवके जन्मादिका कारण है॥ ७६-७७॥

यह अर्थ श्लोक 76–77 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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