श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.78

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यदाक्षैश्‍चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत्।

सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः॥ ७८

yadākṣaiścaritān dhyāyan karmāṇyācinute'sakṛt|

sati karmaṇyavidyāyāṃ bandhaḥ karmaṇyanātmanaḥ|| 78

अर्थ

जीव जब इन्द्रियजनित भोगोंका चिन्तन करते हुए बार-बार उन्हींके लिये कर्म करता है, तब उन कर्मोंके होते रहनेसे अविद्यावश वह देहादिके कर्मोंमें बँध जाता है॥ ७८॥

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