श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.84

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

एतन्मुकुन्दयशसा भुवनं पुनानं

देवर्षिवर्यमुखनिःसृतमात्मशौचम्।

यः कीर्त्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठ्यं

नास्मिन् भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्धः॥ ८४

etanmukundayaśasā bhuvanaṃ punānaṃ

devarṣivaryamukhaniḥsṛtamātmaśaucam|

yaḥ kīrtyamānamadhigacchati pārameṣṭhyaṃ

nāsmin bhave bhramati muktasamastabandhaḥ|| 84

अर्थ

देवर्षि नारदके मुखसे निकला हुआ यह आत्मज्ञान भगवान् मुकुन्दके यशसे सम्बद्ध होनेके कारण त्रिलोकीको पवित्र करनेवाला, अन्तःकरणका शोधक तथा परमात्मपदको प्रकाशित करनेवाला है। जो पुरुष इसकी कथा सुनेगा, वह समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जायगा और फिर उसे इस संसार-चक्रमें नहीं भटकना पड़ेगा॥ ८४॥

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