एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः॥ ८५
adhyātmapārokṣyamidaṃ mayādhigatamadbhutam|
evaṃ striyā''śramaḥ puṃsaśchinno'mutra ca saṃśayaḥ|| 85
अर्थ
विदुरजी! गृहस्थाश्रमी पुरंजनके रूपकसे परोक्षरूपमें कहा हुआ यह अद्भुत आत्मज्ञान मैंने गुरुजीकी कृपासे प्राप्त किया था। इसका तात्पर्य समझ लेनेसे बुद्धियुक्त जीवका देहाभिमान निवृत्त हो जाता है तथा उसका ‘परलोकमें जीव किस प्रकार कर्मोंका फल भोगता है’ यह संशय भी मिट जाता है॥ ८५॥
अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम्।
एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः॥ ८५
विदुरजी! गृहस्थाश्रमी पुरंजनके रूपकसे परोक्षरूपमें कहा हुआ यह अद्भुत आत्मज्ञान मैंने गुरुजीकी कृपासे प्राप्त किया था। इसका तात्पर्य समझ लेनेसे बुद्धियुक्त जीवका देहाभिमान निवृत्त हो जाता है तथा उसका ‘परलोकमें जीव किस प्रकार कर्मोंका फल भोगता है’ यह संशय भी मिट जाता है॥ ८५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.85 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 564) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/85/