श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

व्यक्तं त्वमुत्कृष्टगतेः प्रजापतेः

प्रियाऽऽत्मजानामसि सुभ्रु सम्मता।

अथापि मानं न पितुः प्रपत्स्यसे

मदाश्रयात्कः परितप्यते यतः॥ २०

vyaktaṃ tvamutkṛṣṭagateḥ prajāpateḥ

priyā''tmajānāmasi subhru sammatā|

athāpi mānaṃ na pituḥ prapatsyase

madāśrayātkaḥ paritapyate yataḥ|| 20

अर्थ

सुन्दरि! अवश्य ही मैं यह जानता हूँ कि तुम परमोन्‍नतिको प्राप्त हुए दक्षप्रजापतिको अपनी कन्याओंमें सबसे अधिक प्रिय हो। तथापि मेरी आश्रिता होनेके कारण तुम्हें अपने पितासे मान नहीं मिलेगा; क्योंकि वे मुझसे बहुत जलते हैं॥ २०॥✎ 1316

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1316 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दक्ष-प्रजापतिको → दक्षप्रजापतिको

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