॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.3.21
पापच्यमानेन हृदाऽऽतुरेन्द्रियः
समृद्धिभिः पूरुषबुद्धिसाक्षिणाम्।
अकल्प एषामधिरोढुमंजसा
पदं परं द्वेष्टि यथासुरा हरिम्॥ २१
pāpacyamānena hṛdā''turendriyaḥ
samṛddhibhiḥ pūruṣabuddhisākṣiṇām|
akalpa eṣāmadhiroḍhumaṃjasā
padaṃ paraṃ dveṣṭi yathāsurā harim|| 21
अर्थ
जीवकी चित्तवृत्तिके साक्षी अहंकारशून्य महापुरुषोंकी समृद्धिको देखकर जिसके हृदयमें सन्ताप और इन्द्रियोंमें व्यथा होती है, वह पुरुष उनके पदको तो सुगमतासे प्राप्त कर नहीं सकता; बस, दैत्यगण जैसे श्रीहरिसे द्वेष मानते हैं, वैसे ही उनसे कुढ़ता रहता है॥ २१॥✎ 1316