श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सत्युवाच

प्रजापतेस्ते श्‍वशुरस्य साम्प्रतं

निर्यापितो यज्ञमहोत्सवः किल।

वयं च तत्राभिसराम वाम ते

यद्यर्थितामी विबुधा व्रजन्ति हि॥ ८

prajāpateste śvaśurasya sāmprataṃ

niryāpito yajñamahotsavaḥ kila|

vayaṃ ca tatrābhisarāma vāma te

yadyarthitāmī vibudhā vrajanti hi|| 8

अर्थ

सतीने कहा—वामदेव! सुना है, इस समय आपके ससुर दक्षप्रजापतिके यहाँ बड़ा भारी यज्ञोत्सव हो रहा है। देखिये, ये सब देवता वहीं जा रहे हैं; यदि आपकी इच्छा हो तो हम भी चलें॥ ८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें