श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तस्मिन् भगिन्यो मम भर्तृभिः स्वकै-

र्ध्रुवं गमिष्यन्ति सुहृद‍्दिदृक्षवः।

अहं च तस्मिन् भवताभिकामये

सहोपनीतं परिबर्हमर्हितुम्॥ ९

tasmin bhaginyo mama bhartṛbhiḥ svakai-

rdhruvaṃ gamiṣyanti suhṛddidṛkṣavaḥ|

ahaṃ ca tasmin bhavatābhikāmaye

sahopanītaṃ paribarhamarhitum|| 9

अर्थ

इस समय अपने आत्मीयोंसे मिलनेके लिये मेरी बहिनें भी अपने-अपने पतियोंके सहित वहाँ अवश्य आयेंगी। मैं भी चाहती हूँ कि आपके साथ वहाँ जाकर माता-पिताके दिये हुए गहने, कपड़े आदि उपहार स्वीकार करूँ॥ ९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें