भगवद्भक्तोंके समाजमें सदा-सर्वदा भगवान्की मधुर-मधुर कथाएँ होती रहती हैं, जिनके श्रवणमात्रसे भोगतृष्णा शान्त हो जाती है। वहाँ प्राणियोंमें किसी प्रकारका वैर-विरोध या उद्वेग नहीं रहता ॥ ३५॥✎ 4231348
यत्रेड्यन्ते कथा मृष्टास्तृष्णायाः प्रशमो यतः।
निर्वैरं यत्र भूतेषु नोद्वेगो यत्र कश्चन॥ ३५
भगवद्भक्तोंके समाजमें सदा-सर्वदा भगवान्की मधुर-मधुर कथाएँ होती रहती हैं, जिनके श्रवणमात्रसे भोगतृष्णा शान्त हो जाती है। वहाँ प्राणियोंमें किसी प्रकारका वैर-विरोध या उद्वेग नहीं रहता ॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 568) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/30/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)