॥ श्रीहरिः ॥
यत्र नारायणः साक्षाद्भगवान्न्यासिनां गतिः।
संस्तूयते सत्कथासु मुक्तसङ्गैः पुनः पुनः॥ ३६
yatra nārāyaṇaḥ sākṣādbhagavānnyāsināṃ gatiḥ|
saṃstūyate satkathāsu muktasaṅgaiḥ punaḥ punaḥ|| 36
अर्थ
अच्छे-अच्छे कथा-प्रसंगोंद्वारा निष्कामभावसे संन्यासियोंके एकमात्र आश्रय साक्षात् श्रीनारायणदेवका बार-बार गुणगान होता रहता है॥ ३६॥✎ 423 1348
यत्र नारायणः साक्षाद्भगवान्न्यासिनां गतिः।
संस्तूयते सत्कथासु मुक्तसङ्गैः पुनः पुनः॥ ३६
अच्छे-अच्छे कथा-प्रसंगोंद्वारा निष्कामभावसे संन्यासियोंके एकमात्र आश्रय साक्षात् श्रीनारायणदेवका बार-बार गुणगान होता रहता है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 568) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/30/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #423 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #1348 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे