तब उन्होंने पृथ्वीको वृक्ष, लता आदिसे रहित कर देनेके लिये अपने मुखसे प्रचण्ड वायु और अग्निको छोड़ा, जैसे कालाग्निरुद्र प्रलयकालमें छोड़ते हैं॥ ४५॥✎ 4244251349
ततोऽग्निमारुतौ राजन्नमुञ्चन्मुखतो रुषा।
महीं निर्वीरुधं कर्तुं संवर्तक इवात्यये॥ ४५
तब उन्होंने पृथ्वीको वृक्ष, लता आदिसे रहित कर देनेके लिये अपने मुखसे प्रचण्ड वायु और अग्निको छोड़ा, जैसे कालाग्निरुद्र प्रलयकालमें छोड़ते हैं॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 569) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/30/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)