श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

तत्रावशिष्टा ये वृक्षा भीता दुहितरं तदा।

उज्जह्रुस्ते प्रचेतोभ्य उपदिष्टाः स्वयम्भुवा॥ ४७ ✎ 1041

tatrāvaśiṣṭā ye vṛkṣā bhītā duhitaraṃ tadā|

ujjahruste pracetobhya upadiṣṭāḥ svayambhuvā|| 47

अर्थ

फिर जो कुछ वृक्ष वहाँ बचे थे, उन्होंने डरकर ब्रह्माजीके कहनेसे वह कन्या लाकर प्रचेताओंको दी॥ ४७॥✎ 424 425 1349

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #424 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #425 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1041 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): उज्जहृस्ते → उज्जह्रुस्ते
  • #1349 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीहरि-की → श्रीहरिकी

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