श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

तं प्रजासर्गरक्षायामनादिरभिषिच्य च।

युयोज युयुजेऽन्यांश्‍च स वै सर्वप्रजापतीन्॥ ५१

taṃ prajāsargarakṣāyāmanādirabhiṣicya ca|

yuyoja yuyuje'nyāṃśca sa vai sarvaprajāpatīn|| 51

अर्थ

इन्हें ब्रह्माजीने प्रजापतियोंके नायकके पदपर अभिषिक्त कर सृष्टिकी रक्षाके लिये नियुक्त किया और इन्होंने मरीचि आदि दूसरे प्रजापतियोंको अपने-अपने कार्यमें नियुक्त किया॥ ५१॥✎ 424 425 1349

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #424 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #425 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1349 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीहरि-की → श्रीहरिकी

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