वास्तवमें समस्त कल्याणोंकी अवधि आत्मा ही है और आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले श्रीहरि ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रिय आत्मा हैं॥ १३॥✎ 427
श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थतः।
सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः प्रियः॥ १३
वास्तवमें समस्त कल्याणोंकी अवधि आत्मा ही है और आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले श्रीहरि ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रिय आत्मा हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 571) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/31/13/
टिप्पणियाँ
५
प्रा० पा०—रात्मपदः प्रि०।
(मुद्रित पृष्ठ 571)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#427 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्की