श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यथा तरोर्मूलनिषेचनेन

तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः।

प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां

तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥ १४

yathā tarormūlaniṣecanena

tṛpyanti tatskandhabhujopaśākhāḥ|

prāṇopahārācca yathendriyāṇāṃ

tathaiva sarvārhaṇamacyutejyā|| 14

अर्थ

जिस प्रकार वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसके तना, शाखा, उपशाखा आदि सभीका पोषण हो जाता है और जैसे भोजनद्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार श्रीभगवान्‌की पूजा ही सबकी पूजा है॥ १४॥✎ 427

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #427 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें