श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां

कालं प्रधानं पुरुषं परेशम्।

स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाह-

मात्मैकभावेन भजध्वमद्धा॥ १८

tenaikamātmānamaśeṣadehināṃ

kālaṃ pradhānaṃ puruṣaṃ pareśam|

svatejasā dhvastaguṇapravāha-

mātmaikabhāvena bhajadhvamaddhā|| 18

अर्थ

अतः तुम ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंके भी अधीश्‍वर श्रीहरिको अपनेसे अभिन्‍न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियोंके एकमात्र आत्मा हैं। वे ही जगत‍्के निमित्तकारण काल, उपादानकारण प्रधान और नियन्ता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी कालशक्तिसे वे ही इस गुणोंके प्रवाहरूप प्रपंचका संहार कर देते हैं॥ १८॥✎ 428 429 430

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #428 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #429 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #430 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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