वे भक्तवत्सल भगवान् समस्त जीवोंपर दया करनेसे, जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेसे तथा समस्त इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्त करके शान्त करनेसे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥ १९॥✎ 1350
दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्ट्या येन केन वा।
सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जनार्दनः॥ १९
वे भक्तवत्सल भगवान् समस्त जीवोंपर दया करनेसे, जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेसे तथा समस्त इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्त करके शान्त करनेसे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 572) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/31/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1350 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भक्ता-धीनताको → भक्ताधीनताको