श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.5.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

जुह्वतः स्रुवहस्तस्य श्मश्रूणि भगवान् भवः।

भृगोर्लुलुञ्चे सदसि योऽहसच्छ्मश्रु दर्शयन्॥ १९

juhvataḥ sruvahastasya śmaśrūṇi bhagavān bhavaḥ|

bhṛgorluluñce sadasi yo'hasacchmaśru darśayan|| 19

अर्थ

भृगुजी हाथमें स्रुवा लिये हवन कर रहे थे। वीरभद्रने इनकी दाढ़ी-मूँछ नोच लीं; क्योंकि इन्होंने प्रजापतियोंकी सभामें मूँछें ऐंठते हुए महादेवजीका उपहास किया था॥ १९॥

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