भृगुजी हाथमें स्रुवा लिये हवन कर रहे थे। वीरभद्रने इनकी दाढ़ी-मूँछ नोच लीं; क्योंकि इन्होंने प्रजापतियोंकी सभामें मूँछें ऐंठते हुए महादेवजीका उपहास किया था॥ १९॥
जुह्वतः स्रुवहस्तस्य श्मश्रूणि भगवान् भवः।
भृगोर्लुलुञ्चे सदसि योऽहसच्छ्मश्रु दर्शयन्॥ १९
भृगुजी हाथमें स्रुवा लिये हवन कर रहे थे। वीरभद्रने इनकी दाढ़ी-मूँछ नोच लीं; क्योंकि इन्होंने प्रजापतियोंकी सभामें मूँछें ऐंठते हुए महादेवजीका उपहास किया था॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 427) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/19/