श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कर्णान्त्रैकपदाश्वास्यैर्निर्जुष्टं२ वृकनाभिभिः।

कदलीखण्डसंरुद्धनलिनीपुलिनश्रियम्॥ २१

karṇāntraikapadāśvāsyairnirjuṣṭaṃ vṛkanābhibhiḥ|

kadalīkhaṇḍasaṃruddhanalinīpulinaśriyam|| 21

अर्थ

वहाँ जहाँ-तहाँ हरिन, वानर, सूअर, सिंह, रीछ, साही, नीलगाय, शरभ, बाघ, कृष्णमृग, भैंसे, कर्णान्त्र, एकपद, अश्‍वमुख, भेड़िये और कस्तूरी-मृग घूमते रहते हैं तथा वहाँके सरोवरोंके तट केलोंकी पंक्तियोंसे घिरे होनेके कारण बड़ी शोभा पाते हैं। उसके चारों ओर नन्दा नामकी नदी बहती है, जिसका पवित्र जल देवी सतीके स्नान करनेसे और भी पवित्र एवं सुगन्धित हो गया है। भगवान् भूतनाथके निवासस्थान उस कैलासपर्वतकी ऐसी रमणीयता देखकर देवताओंको बड़ा आश्‍चर्य हुआ॥ २०—२२॥

यह अर्थ श्लोक 20–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कल्लोलूषपदैश्चान्यैर्निर्विष्टं मृगनाभिभिः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 430)

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