॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.6.20
मृगैः शाखामृगैः क्रोडैर्मृगेन्द्रैर्ऋक्षशल्य१कैः।✎ 1022 1023
गवयैः शरभैर्व्याघ्रै रुरुभिर्महिषादिभिः॥ २०
mṛgaiḥ śākhāmṛgaiḥ kroḍairmṛgendrair:ṛkṣaśalyakaiḥ|
gavayaiḥ śarabhairvyāghrai rurubhirmahiṣādibhiḥ|| 20
अर्थ
वहाँ जहाँ-तहाँ हरिन, वानर, सूअर, सिंह, रीछ, साही, नीलगाय, शरभ, बाघ, कृष्णमृग, भैंसे, कर्णान्त्र, एकपद, अश्वमुख, भेड़िये और कस्तूरी-मृग घूमते रहते हैं तथा वहाँके सरोवरोंके तट केलोंकी पंक्तियोंसे घिरे होनेके कारण बड़ी शोभा पाते हैं। उसके चारों ओर नन्दा नामकी नदी बहती है, जिसका पवित्र जल देवी सतीके स्नान करनेसे और भी पवित्र एवं सुगन्धित हो गया है। भगवान् भूतनाथके निवासस्थान उस कैलासपर्वतकी ऐसी रमणीयता देखकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ २०—२२॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—शल्ल०।