विदुरजी! उन नदियोंमें रतिविलाससे थकी हुई देवांगनाएँ अपने-अपने निवासस्थानसे आकर जलक्रीडा करती हैं और उनमें प्रवेशकर अपने प्रियतमोंपर जल उलीचती हैं॥ २५॥✎ 1976
ययोः सुरस्त्रियः क्षत्तरवरुह्य स्वधिष्ण्यतः।
क्रीडन्ति पुंसः सिंचन्त्यो विगाह्य रतिकर्शिताः॥ २५
विदुरजी! उन नदियोंमें रतिविलाससे थकी हुई देवांगनाएँ अपने-अपने निवासस्थानसे आकर जलक्रीडा करती हैं और उनमें प्रवेशकर अपने प्रियतमोंपर जल उलीचती हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 430) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/6/25/
टिप्पणियाँ
४
प्रा० पा०—रतितर्षिताः।
(मुद्रित पृष्ठ 430)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1976 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उसमें → उनमें