श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वमेव भगवन्‍नेतच्छिवशक्त्योः सरूपयोः।

विश्‍वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडन्‍नूर्णपटो यथा॥ ४३

tvameva bhagavannetacchivaśaktyoḥ sarūpayoḥ|

viśvaṃ sṛjasi pāsyatsi krīḍannūrṇapaṭo yathā|| 43

अर्थ

भगवन्! आप मकड़ीके समान ही अपने स्वरूपभूत शिव-शक्तिके रूपमें क्रीडा करते हुए लीलासे ही संसारकी रचना, पालन और संहार करते रहते हैं॥ ४३॥

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