श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वमेव धर्मार्थदुघाभिपत्तये

दक्षेण सूत्रेण ससर्जिथाध्वरम्।

त्वयैव लोकेऽवसिताश्‍च सेतवो

यान्ब्राह्मणाः श्रद्दधते धृतव्रताः॥ ४४

tvameva dharmārthadughābhipattaye

dakṣeṇa sūtreṇa sasarjithādhvaram|

tvayaiva loke'vasitāśca setavo

yānbrāhmaṇāḥ śraddadhate dhṛtavratāḥ|| 44

अर्थ

आपने ही धर्म और अर्थकी प्राप्ति करानेवाले वेदकी रक्षाके लिये दक्षको निमित्त बनाकर यज्ञको प्रकट किया है। आपकी ही बाँधी हुई ये वर्णाश्रमकी मर्यादाएँ हैं, जिनका नियमनिष्ठ ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं॥ ४४॥

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