फिर तुमलोगोंने तो यज्ञमें भगवान् शंकरका प्राप्य भाग न देकर उनका बड़ा भारी अपराध किया है। परन्तु शंकरजी बहुत शीघ्र प्रसन्न होनेवाले हैं,इसलिये तुमलोग शुद्ध हृदयसे उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रसन्न करो—उनसे क्षमा माँगो॥ ५॥✎ 1918
अथापि यूयं कृतकिल्बिषा भवं
ये बर्हिषो भागभाजं परादुः।
प्रसादयध्वं परिशुद्धचेतसा
क्षिप्रप्रसादं प्रगृहीताङ्घ्रिपद्मम्॥ ५
फिर तुमलोगोंने तो यज्ञमें भगवान् शंकरका प्राप्य भाग न देकर उनका बड़ा भारी अपराध किया है। परन्तु शंकरजी बहुत शीघ्र प्रसन्न होनेवाले हैं,इसलिये तुमलोग शुद्ध हृदयसे उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रसन्न करो—उनसे क्षमा माँगो॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 428) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/6/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप