श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अथापि यूयं कृतकिल्बिषा भवं

ये बर्हिषो भागभाजं परादुः।

प्रसादयध्वं परिशुद्धचेतसा

क्षिप्रप्रसादं प्रगृहीताङ्‌घ्रिपद्मम्॥ ५

athāpi yūyaṃ kṛtakilbiṣā bhavaṃ

ye barhiṣo bhāgabhājaṃ parāduḥ|

prasādayadhvaṃ pariśuddhacetasā

kṣipraprasādaṃ pragṛhītāṅghripadmam|| 5

अर्थ

फिर तुमलोगोंने तो यज्ञमें भगवान् शंकरका प्राप्य भाग न देकर उनका बड़ा भारी अपराध किया है। परन्तु शंकरजी बहुत शीघ्र प्रसन्‍न होनेवाले हैं,इसलिये तुमलोग शुद्ध हृदयसे उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रसन्‍न करो—उनसे क्षमा माँगो॥ ५॥✎ 1918

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप

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