श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.4

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तदाकर्ण्य विभुः प्राह तेजीयसि कृतागसि।

क्षेमाय तत्र सा भूयान्‍न प्रायेण बुभूषताम्॥ ४

tadākarṇya vibhuḥ prāha tejīyasi kṛtāgasi|

kṣemāya tatra sā bhūyānna prāyeṇa bubhūṣatām|| 4

अर्थ

अब देवताओंके मुखसे वहाँकी सारी बात सुनकर उन्होंने कहा, ‘देवताओ! परम समर्थ तेजस्वी पुरुषसे कोई दोष भी बन जाय तो भी उसके बदलेमें अपराध करनेवाले मनुष्योंका भला नहीं हो सकता॥ ४॥✎ 1918

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप

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