श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

उपलभ्य पुरैवैतद्भगवानब्जसम्भवः।

नारायणश्‍च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः॥ ३

upalabhya puraivaitadbhagavānabjasambhavaḥ|

nārāyaṇaśca viśvātmā na kasyādhvaramīyatuḥ|| 3

अर्थ

भगवान् ब्रह्माजी और सर्वान्तर्यामी श्रीनारायण पहलेसे ही इस भावी उत्पातको जानते थे, इसीसे वे दक्षके यज्ञमें नहीं गये थे ॥ ३॥✎ 1918

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप

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