श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

संछिन्‍नभिन्‍नसर्वाङ्गाः सर्त्विक्सभ्या भयाकुलाः।

स्वयम्भुवे नमस्कृत्य कार्त्स्न्येनैतन्‍न्यवेदयन्॥ २

saṃchinnabhinnasarvāṅgāḥ sartviksabhyā bhayākulāḥ|

svayambhuve namaskṛtya kārtsnyenaitannyavedayan|| 2

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार जब रुद्रके सेवकोंने समस्त देवताओंको हरा दिया और उनके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग भूत-प्रेतोंके त्रिशूल, पट्टिश, खड्ग, गदा, परिघ और मुद्गर आदि आयुधोंसे छिन्‍न-भिन्‍न हो गये तब वे ऋत्विज् और सदस्योंके सहित बहुत ही डरकर ब्रह्माजीके पास पहुँचे और प्रणाम करके उन्हें सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ १-२॥✎ 1918

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1918 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यज्ञ-स्वरूप → यज्ञस्वरूप

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