श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अध्वर्युणाऽऽत्तहविषा यजमानो विशाम्पते।

धिया विशुद्धया दध्यौ तथा प्रादुरभूद्धरिः॥ १८

adhvaryuṇā''ttahaviṣā yajamāno viśāmpate|

dhiyā viśuddhayā dadhyau tathā prādurabhūddhariḥ|| 18

अर्थ

विदुरजी! उस हविको हाथमें लेकर खड़े हुए अध्वर्युके साथ यजमान दक्षने ज्यों ही विशुद्ध चित्तसे श्रीहरिका ध्यान किया, त्यों ही सहसा भगवान् वहाँ प्रकट हो गये॥ १८॥✎ 362

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #362 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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