‘बृहत्’ एवं ‘रथन्तर’ नामक साम-स्तोत्र जिनके पंख हैं, उन गरुडजीके द्वारा समीप लाये हुए भगवान्ने दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई अपनी अंगकान्तिसे सब देवताओंका तेज हर लिया—उनके सामने सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी॥ १९॥✎ 362
तदा स्वप्रभया तेषां द्योतयन्त्या दिशो दश।
मुष्णंस्तेज उपानीतस्तार्क्ष्येण स्तोत्रवाजिना॥ १९
‘बृहत्’ एवं ‘रथन्तर’ नामक साम-स्तोत्र जिनके पंख हैं, उन गरुडजीके द्वारा समीप लाये हुए भगवान्ने दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई अपनी अंगकान्तिसे सब देवताओंका तेज हर लिया—उनके सामने सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 436) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)