प्रभुके हृदयमें श्रीवत्सका चिह्न था और सुन्दर वनमाला सुशोभित थी। वे अपने उदार हास और लीलामय कटाक्षसे सारे संसारको आनन्दमग्न कर रहे थे। पार्षदगण दोनों ओर राजहंसके समान सफेद पंखे और चँवर डुला रहे थे। भगवान्के मस्तकपर चन्द्रमाके समान शुभ्र छत्र शोभा दे रहा था॥ २१॥✎ 362
वक्षस्यधिश्रितवधूर्वनमाल्युदार-
हासावलोककलया रमयंश्च विश्वम्।
पार्श्वभ्रमद्व्यजनचामरराजहंसः
श्वेतातपत्रशशिनोपरि रज्यमानः॥ २१
प्रभुके हृदयमें श्रीवत्सका चिह्न था और सुन्दर वनमाला सुशोभित थी। वे अपने उदार हास और लीलामय कटाक्षसे सारे संसारको आनन्दमग्न कर रहे थे। पार्षदगण दोनों ओर राजहंसके समान सफेद पंखे और चँवर डुला रहे थे। भगवान्के मस्तकपर चन्द्रमाके समान शुभ्र छत्र शोभा दे रहा था॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 436) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)