यद्यपि भगवान्की महिमातक ब्रह्मा आदिकी मति भी नहीं पहुँच पाती, तो भी भक्तोंपर कृपा करनेके लिये दिव्यरूपमें प्रकट हुए श्रीहरिकी वे अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार स्तुति करने लगे॥ २४॥✎ 363
अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महि त्वात्मभुवादयः।
यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम्॥ २४
यद्यपि भगवान्की महिमातक ब्रह्मा आदिकी मति भी नहीं पहुँच पाती, तो भी भक्तोंपर कृपा करनेके लिये दिव्यरूपमें प्रकट हुए श्रीहरिकी वे अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार स्तुति करने लगे॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 436) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)