॥ श्रीहरिः ॥
तत्तेजसा हतरुचः सन्नजिह्वाः ससाध्वसाः।
मूर्ध्ना धृतांजलिपुटा उपतस्थुरधोक्षजम्॥ २३
tattejasā hatarucaḥ sannajihvāḥ sasādhvasāḥ|
mūrdhnā dhṛtāṃjalipuṭā upatasthuradhokṣajam|| 23
अर्थ
उनके तेजसे सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी, जिह्वा लड़खड़ाने लगी, वे सब-के-सब सकपका गये और मस्तकपर अंजलि बाँधकर भगवान्के सामने खड़े हो गये॥ २३॥✎ 363
तत्तेजसा हतरुचः सन्नजिह्वाः ससाध्वसाः।
मूर्ध्ना धृतांजलिपुटा उपतस्थुरधोक्षजम्॥ २३
उनके तेजसे सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी, जिह्वा लड़खड़ाने लगी, वे सब-के-सब सकपका गये और मस्तकपर अंजलि बाँधकर भगवान्के सामने खड़े हो गये॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 436) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #363 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की