श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भैया विदुर! जब इस प्रकार सब लोग यज्ञरक्षक भगवान् हृषीकेशकी स्तुति करने लगे, तब परम चतुर दक्षने रुद्रपार्षद वीरभद्रके ध्वंस किये हुए यज्ञको फिर आरम्भ कर दिया॥ ४८॥
इति दक्षः कविर्यज्ञं भद्र रुद्रावमर्शितम्।
कीर्त्यमाने हृषीकेशे संनिन्ये यज्ञभावने॥ ४८
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भैया विदुर! जब इस प्रकार सब लोग यज्ञरक्षक भगवान् हृषीकेशकी स्तुति करने लगे, तब परम चतुर दक्षने रुद्रपार्षद वीरभद्रके ध्वंस किये हुए यज्ञको फिर आरम्भ कर दिया॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 441) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/48/