श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

बाहुभ्यामश्विनोः पूष्णो हस्ताभ्यां कृतबाहवः।

भवन्त्वध्वर्यवश्चान्ये बस्तश्मश्रुर्भृगुर्भवेत्॥ ५

bāhubhyāmaśvinoḥ pūṣṇo hastābhyāṃ kṛtabāhavaḥ|

bhavantvadhvaryavaścānye bastaśmaśrurbhṛgurbhavet|| 5

अर्थ

अध्वर्यु आदि याज्ञिकोंमेंसे जिनकी भुजाएँ टूट गयी हैं वे अश्विनीकुमारकी भुजाओंसे और जिनके हाथ नष्ट हो गये हैं वे पूषाके हाथोंसे काम करें तथा भृगुजीके बकरेकी-सी दाढ़ी-मूँछ हो जाय’॥ ५॥✎ 361

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #361 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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