उस समय घमण्डसे भरी हुई सुरुचिने अपनी सौतके पुत्र ध्रुवको महाराजकी गोदमें आनेका यत्न करते देख उनके सामने ही उससे डाहभरे शब्दोंमें कहा॥ १०॥
तथा चिकीर्षमाणं तं सपत्न्यास्तनयं ध्रुवम्।
सुरुचिः शृण्वतो राज्ञः सेर्ष्यमाहातिगर्विता॥ १०
उस समय घमण्डसे भरी हुई सुरुचिने अपनी सौतके पुत्र ध्रुवको महाराजकी गोदमें आनेका यत्न करते देख उनके सामने ही उससे डाहभरे शब्दोंमें कहा॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 444) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/10/