॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.17
दीर्घं श्वसन्ती वृजिनस्य पार-
मपश्यती बालकमाह बाला।
मामंगलं तात परेषु मंस्था
भुङ्क्ते जनो यत्परदुःखदस्तत्॥ १७
dīrghaṃ śvasantī vṛjinasya pāra-
mapaśyatī bālakamāha bālā|
māmaṃgalaṃ tāta pareṣu maṃsthā
bhuṅkte jano yatparaduḥkhadastat|| 17
अर्थ
उस बेचारीको अपने दुःखपारावारका कहीं अन्त ही नहीं दिखायी देता था। उसने गहरी साँस लेकर ध्रुवसे कहा, ‘बेटा! तू दूसरोंके लिये किसी प्रकारके अमंगलकी कामना मत कर। जो मनुष्य दूसरोंको दुःख देता है, उसे स्वयं ही उसका फल भोगना पड़ता है॥ १७॥