श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सत्यं सुरुच्याभिहितं भवान्मे

यद् दुर्भगाया उदरे गृहीतः।

स्तन्येन वृद्धश्‍च विलज्जते यां

भार्येति वा वोढुमिडस्पतिर्माम्॥ १८

satyaṃ surucyābhihitaṃ bhavānme

yad durbhagāyā udare gṛhītaḥ|

stanyena vṛddhaśca vilajjate yāṃ

bhāryeti vā voḍhumiḍaspatirmām|| 18

अर्थ

सुरुचिने जो कुछ कहा है, ठीक ही है; क्योंकि महाराजको मुझे ‘पत्नी’ तो क्या, ‘दासी’ स्वीकार करनेमें भी लज्जा आती है। तूने मुझ मन्दभागिनीके गर्भसे ही जन्म लिया है और मेरे ही दूधसे तू पला है॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें