यदि तुझे मानापमानका विचार ही हो, तो बेटा! असलमें मनुष्यके असन्तोषका कारण मोहके सिवा और कुछ नहीं है। संसारमें मनुष्य अपने कर्मानुसार ही मान-अपमान या सुख-दुःख आदिको प्राप्त होता है॥ २८॥
विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसंतोषहेतवः।
पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोके निजकर्मभिः॥ २८
यदि तुझे मानापमानका विचार ही हो, तो बेटा! असलमें मनुष्यके असन्तोषका कारण मोहके सिवा और कुछ नहीं है। संसारमें मनुष्य अपने कर्मानुसार ही मान-अपमान या सुख-दुःख आदिको प्राप्त होता है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/28/