तात! भगवान्की गति बड़ी विचित्र है! इसलिये उसपर विचार करके बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि दैववश उसे जैसी भी परिस्थितिका सामना करना पड़े, उसीमें सन्तुष्ट रहे॥ २९॥✎ 367368
परितुष्येत्ततस्तात तावन्मात्रेण पूरुषः।
दैवोपसादितं यावद्वीक्ष्येश्वरगतिं बुधः॥ २९
तात! भगवान्की गति बड़ी विचित्र है! इसलिये उसपर विचार करके बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि दैववश उसे जैसी भी परिस्थितिका सामना करना पड़े, उसीमें सन्तुष्ट रहे॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)