श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

परितुष्येत्ततस्तात तावन्मात्रेण पूरुषः।

दैवोपसादितं यावद्वीक्ष्येश्‍वरगतिं बुधः॥ २९

parituṣyettatastāta tāvanmātreṇa pūruṣaḥ|

daivopasāditaṃ yāvadvīkṣyeśvaragatiṃ budhaḥ|| 29

अर्थ

तात! भगवान्‌की गति बड़ी विचित्र है! इसलिये उसपर विचार करके बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि दैववश उसे जैसी भी परिस्थितिका सामना करना पड़े, उसीमें सन्तुष्ट रहे॥ २९॥✎ 367 368

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #367 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #368 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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