श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अथ मात्रोपदिष्टेन योगेनावरुरुत्ससि।

यत्प्रसादं स वै पुंसां दुराराध्यो मतो मम॥ ३०

atha mātropadiṣṭena yogenāvarurutsasi|

yatprasādaṃ sa vai puṃsāṃ durārādhyo mato mama|| 30

अर्थ

अब, माताके उपदेशसे तू योगसाधनद्वारा जिन भगवान्‌की कृपा प्राप्त करने चला है—मेरे विचारसे साधारण पुरुषोंके लिये उन्हें प्रसन्‍न करना बहुत ही कठिन है॥ ३०॥✎ 367 368

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #367 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #368 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें