योगीलोग अनेकों जन्मोंतक अनासक्त रहकर समाधियोगके द्वारा बड़ी-बड़ी कठोर साधनाएँ करते रहते हैं, परन्तु भगवान्के मार्गका पता नहीं पाते॥ ३१॥✎ 367368
मुनयः पदवीं यस्य निःसंगेनोरुजन्मभिः।
न विदुर्मृगयन्तोऽपि तीव्रयोगसमाधिना॥ ३१
योगीलोग अनेकों जन्मोंतक अनासक्त रहकर समाधियोगके द्वारा बड़ी-बड़ी कठोर साधनाएँ करते रहते हैं, परन्तु भगवान्के मार्गका पता नहीं पाते॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)